राजस्थान के इस मंदिर का 'शिवलिंग' सूर्य के हिसाब से बदलता है दिशा,आइए पढ़े खबर

राजस्थान के इस मंदिर का शिवलिंग सूर्य के हिसाब से बदलता है दिशा,आइए पढ़े खबर

जयपुर :भारत में कई अनूठे मंदिर हैं, जिनमें राजस्थान का मालेश्वर महादेव मंदिर भी शामिल है। राजस्थान अपनी कला-संस्कृति के साथ अपने अनोखे और ऐतिहासिक मंदिरों के लिए भी विश्वविख्यात है। यहां कई ऐसे मंदिर हैं जिनके चमत्कार आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसा ही एक मंदिर राजधानी जयपुर के पास अरावली पर्वत शृंखला के बीच बसे सामोद स्थित महार कलां गांव में है।

इस मंदिर में एक अनूठा शिवलिंग है जो हर 6 महीने में दिशा बदलता है। मंदिर में विराजमान शिवलिंग सूर्य की दिशा के अनुरूप चलने लिए विख्यात है।

जानिए इसके बारे में -



- मालेश्वर महादेव मंदिर जयपुर से 35 किमी दूर सामोद में है। यह स्थान चौमूं से करीब 8 किमी दूर है। सूर्यदेव वर्ष में छह माह में उत्तरायण और छह महीने दक्षिणायन होते हैं। सूर्य देव के साथ ही यह शिवलिंग भी अपनी स्थिति बदलता है। कहा जाता है कि विक्रम संवत 1101 काल के इस मंदिर में स्वयंभूलिंग विराजमान है। इस मंदिर में कालसर्प दोष और पितृ दोष के लिए विशेष पूजा अर्चना की जाती है।

- इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर के पास बसा महार कलां गांव पौराणिक काल में महाबली राजा सहस्रबाहु की माहिषमति नगरी हुआ करती थी।

ऐसे पड़ा मंदिर का नाम मालेश्वर महादेव

मंदिर के पुजारी के अनुसार, वर्तमान में महार कलां गांव पौराणिक काल में महाबली राजा सहस्रबाहु की माहिशमति नगरी हुआ करती थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम मालेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। विक्रम संवत 1101 काल के इस मंदिर में स्वयंभूलिंग विराजमान है।

कुण्डों में पानी कभी नहीं होता खाली

यह स्थान जयपुर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर है। विक्रम संवत 1101 काल के इस मंदिर में स्वयंभूलिंग विराजमान है। प्रकृति की गोद में बसा यह स्थान अपने आप में काफी मनोरम है। जहां बारिश में बहते प्राकृतिक झरने, पानी के कुण्ड, आसपास पौराणिक मानव सभ्यता-संस्कृति की कहानी कहते अति प्राचीन खण्डहर इस स्थान की प्राचीनता को दर्शाते हैं। इस मंदिर के आसपास चार प्राकृतिक कुण्ड हैं, जिनका पानी कभी खाली नहीं होता हैं। ये कुण्ड मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों, जलाभिषेक और सवामणी आदि करने वालों के लिए प्रमुख जलस्रोत हैं।

लोगों को लुभाते हैं प्राकृतिक झरने

पहाडिय़ों से घिरे इस धार्मिक स्थल पर प्रकृति भी जमकर मेहरबान है। बारिश में मंदिर के आसपास प्राकृतिक झरने बहने लगते हैं। जो यहां की छटा को और भी मनमोहक बना देते हैं। बारिश के दिनों में रोज गोठें होती हैं।

मुगलों ने किया था हमला, पर नहीं तोड़ पाए थे शिवलिंग

इस अतिप्राचीन मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में एक कथा भी प्रचलित है। लोग बताते हैं कि मुगलों ने इस मंदिर को भी नष्ट करने की कोशिश की थी। औरंगजेब ने यहां हमला किया था, लेकिन वह शिवलिंग तक पहुंच पाता, इससे पहले ही मधुमक्खियों का हमला हो गया। मुगलों ने यह स्थापित विष्णु भगवान की मूर्ति को तो तोड़ दिया, लेकिन शिवलिंग को छू भी नहीं पाए।

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