अब सगंध खेती चमकाएगी 50 हजार किसानों की किस्मत, जानिए कैसे

अब सगंध खेती चमकाएगी 50 हजार किसानों की किस्मत, जानिए कैसे

देहरादून : पलायन की मार से त्रस्त उत्तराखंड में अब सगंध खेती (सुगंध देने वाले पौधे) न सिर्फ किसानों की किस्मत चमकाएगी, बल्कि बंजर खेतों में फिर से हरियाली भी लहलहाएगी। राज्य में सगंध खेती के उत्साहजनक नतीजों और इसकी अपार संभावनाओं के मद्देनजर अब सगंध पौधा केंद्र (कैप) देहरादून ने अगले पांच साल का खाका खींचा है। इसके तहत हर साल सगंध खेती का दायरा पांच हजार हेक्टेयर बढ़ाकर प्रतिवर्ष 10 हजार किसानों को इससे जोड़ने का लक्ष्य है। पांच वर्षों में मुहिम से 50 हजार किसानों को जोड़ा जाएगा, ताकि वे भी आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें। वर्तमान में प्रदेश में साढ़े आठ हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 18120 किसान सगंध फसलों की खेती कर रहे हैं और उनका सालाना टर्नओवर है लगभग 70 करोड़।

विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले उत्तराखंड के गांवों से हो रहे पलायन ने खेती-किसानी को गहरे तक प्रभावित किया है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में यहां आठ लाख हेक्टेयर में खेती होती थी, जबकि 2.66 लाख हेक्टेयर जमीन बंजर थी। राज्य गठन के बाद अब खेती का रकबा घटकर सात लाख हेक्टेयर पर आ गया है, जबकि बंजर भूमि का क्षेत्रफल बढ़कर 3.66 लाख हेक्टेयर हो गया है। ऐसे में राज्य सरकार के प्रतिष्ठान सगंध पौधा केंद्र देहरादून ने उम्मीद की लौ जगाई।

वर्ष 2004 में देहरादून के राजावाला गांव से शुरू की गई सगंध खेती की मुहिम अब राज्य के 109 एरोमा क्लस्टरों तक पहुंच चुकी है। यही नहीं, मौजूदा सरकार ने भी राज्य की विषम परिस्थितियों और लोगों खेती-किसानी से जोडऩे के साथ ही किसानों की आय दोगुना करने के लिहाज से सगंध खेती को बढ़ावा देने की ठानी है। इसके लिए प्रयास शुरू कर दिए गए हैं और योजना का खाका भी खींच लिया गया है।

सगंध पौधा केंद्र के निदेशक डॉ. नृपेंद्र चौहान बताते हैं कि अगले पांच वर्षों में राज्य में 50 हजार लोगों को सगंध खेती से जोड़ा जाएगा। इसके लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, मनरेगा, हॉर्टिकल्चर मिशन के साथ ही राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत सगंध खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा एरोमा पार्क भी विभिन्न स्थानों पर तैयार होंगे, जहां किसान संगध खेती से मिलने वाले सगंध तेल समेत उत्पादों की बिक्री कर सकेंगे। यही नहीं, एरोमा पार्क में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के दरवाजे भी खुलेंगे।

पीएम से भी मिल चुकी सराहना

चमोली जिले के जोशीमठ क्षेत्र के 12 गांवों में गुलाब की खेती खूब महक रही है। वहां गुलाब जल व तेल का उत्पादन हो रहा है। पिछले वर्ष यहां तैयार हुए गुलाब जल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट किया गया था। इसकी उन्होंने मुक्तकंठ से सराहना की थी।

पांच लाख रुपये प्रति लीटर है दाम

गुलाब तेल का समर्थन मूल्य पांच लाख रुपये प्रति लीटर निर्धारित किया गया है। संबंधित किसान इस दाम पर इसे सगंध पौधा केंद्र को दे सकते हैं। हालांकि, खुले बाजार में यह छह से सात लाख रुपये लीटर बिकता है।

कैमोमाइल की पहुंच यूरोप तक

सगंध खेती के तहत उत्तराखंड में उत्पादित कैमोमाइल के फूल यूरोप तक जा रहे हैं। इसके फूलों को चाय बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।

लैमनग्रास ने बदली तकदीर

सगंध खेती के तहत लैमनग्रास की खेती के जरिये ही तमाम क्षेत्रों में किसानों की तकदीर बदली है। फिर चाहे वह जयहरीखाल ब्लाक के पीड़ा के वीरेंद्र सिंह रावत हों या द्वारीखाल ब्लाक के दिखेत के चंद्रमोहन सिंह बिष्ट अथवा पोखड़ा ब्लाक के किमगडीगाड-गवाणी के कमल सिंह, इन्होंने लैमनग्रास की खेती कर नजीर पेश की है। वह कहते हैं कि बंजर भूमि को फिर से आबाद करने और किसानों की झोलियां भरने में सगंध खेती बेहद महत्वपूर्ण है।

इन फसलों को दे रहे बढ़ावा



लैमनग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा, जामारोजा, तुलसी, मिंट, कैमोमाइल, गेंदा, आर्टिमीशिया, जिरेनियम, स्याहजीरा, तेजपात, गुलाब, थाइम आदि।



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