देश के सियासी समीकरणों में उथल पुथल मचा कर रख देंगे 5 राज्यों के नतीजे

देश के सियासी समीकरणों में उथल पुथल मचा कर रख देंगे 5 राज्यों के नतीजे

संदीप ठाकुर

नई दिल्ली। आगामी 11 दिसंबर को आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे देश के सियासी समीकरण पर सीधा सपाट प्रभाव डालेंगे। यदि नतीजे अनुकूल आए ताे केंद्र की राजनीति में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का सियासी कद एकाएक बढ़ जाएगा आैर परिणाम इसके उलट आने पर कांग्रेस काे

काेई पूछने वाला नहीं हाेगा। एेसी हालत में कांग्रेस के समक्ष 2019 लोकसभा चुनाव में क्षत्रपों के सामने हथियार डालने के अलावा दूसरा काेई विकल्प नहीं बचेगा। कमाेवेश यही हालत भाजपा की भी हाेगी। पक्ष में नतीजे आने पर राजग में भाजपा पर हमलावर दल अचानक रक्षात्मक भूमिका में होंगे, वहीं प्रतिकूल परिणाम आने पर दूसरे सहयोगी भी भाजपा पर दबाव का सियासी दांव आजमाने से बाज नहीं आएंगे। एेसे में भाजपा में टूटफूट की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं। इन चुनावों ने भाजपा और कांग्रेस के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं की सियासी परिस्थिति पैदा कर दी है। दोनों दलों को पता है कि लोकसभा चुनाव से एेन पहले होने वाले इस चुनाव के नतीजे से ही भविष्य में गठबंधन की राजनीति की दिशा तय होगी। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि इन पांच राज्यों में से तीन राज्यों में पार्टी सत्तारूढ़ है, जबकि कांग्रेस के पास सकारात्मक परिणाम लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। वर्तमान परिस्थति की बात करें तो टीडीपी की विदाई के बाद शिवसेना, रालोसपा, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी विभिन्न कारणों से भाजपा पर हमलावर है। इनमें शिवसेना पहले ही लोकसभा चुनाव में गठबंधन नहीं करने की घोषणा कर चुकी है। दूसरे दलों में लोजपा ने बिहार में सीटों केबंटवारे को हरी झंडी नहीं दी है तो सीटों की संख्या से संतुष्ट जदयू जल्द से जल्द सीट चिन्हित करना चाहती है। अपना दल के शीर्ष नेतृत्व का भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बेहतर संबंध हैं, मगर पार्टी यूपी में राज्य भाजपा से बेहद खफा है। ऐसे में सकारात्मक परिणाम जहां सहयोगियों को रक्षात्मक बनने पर मजबूर करेंगे, वहीं नकारात्मक परिणाम आने पर ये सभी दल एक साथ भाजपा पर सियासी दबाव बनाएंगे।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जद(एस) को सरकार की कमान दे कर भाजपा को सत्ता से दूर रखने के बाद इन राज्यों के चुनाव कांग्रेस की आखिरी उम्मीद है। बेहतर सफलता न सिर्फ राहुल का सियासी कद बढ़ाएगा, बल्कि यूपीए को नए सिरे से जिंदा भी करेगा। इसके उलट स्थिति में भाजपा को सत्ता से दूर करने

के लिए कांग्रेस के सामने क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों के आगे हथियार डालने का ही एकमात्र विकल्प बचेगा। नकारात्मक नतीजे सर्वाधिक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की छवि को नुकसान पहुंचाने के साथ साथ उनके नेतृत्व क्षमता पर भी सवालिया निशान खड़ा करेंगे। दूसरे शब्दाें में कहा जाए ताे कांग्रेस पार्टी पर ही इतना बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाएगा कि उसे हटाने में पार्टी काे शायद वर्षाे लग जाए।

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