संघ को भी झांकना होगा अपने गिरेबान में

संघ को भी झांकना होगा अपने गिरेबान में

रायपुर। कोरबा के भाजपा सांसद ने एक स्टिंग ऑपरेशन में कहा है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में 90 फ़ीसदी बेईमान है। उनका यह कथन सोचनीय व विचारणीय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यापक रूप से भारत के सत्तारूढ़ दल का पैतृक संगठन है और इसे विश्व के सबसे बृहत स्वयंसेवी संगठन के तौर पर जाना जाता है। वस्तुतः संघ कथित तौर पर हिंदू अनुशासन के माध्यम से चरित्र प्रशिक्षण अपनी शाखाओं के माध्यम से देता है। इसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए हिंदू समुदाय को एकजुट करना है। इस हिंदू राष्ट्रवादी संगठन से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदू वादी दृष्टिकोण से काम करने वाले कई संगठन जुड़े हैं या फिर वह उनका जनक है। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित संघ के वर्तमान में पूरे भारत में 55,000 से अधिक शाखाएं लगती हैं तथा यह 80 से अधिक देशों में कार्यरत है। 50 से ज्यादा इससे जुड़े संगठन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। 200 से अधिक इसके अनुषंगिक संगठन क्षेत्रीय प्रभाव वाले हैं। आपातकाल के पूर्व इस की राजनीति शाखा भारतीय जनसंघ के रूप में सामने आई। उसके बाद इसका राजनीतिक महत्व बढ़ा और जनसंघ नए राजनीतिक कलेवर एवं तेवर के साथ भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्तारूढ़ होने के बाद से आम जनता ने इसे राजनीतिक तौर पर ज्यादा सक्रिय रूप से महसूस किया है। एक समय स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं इंदिरा गांधी ने इसके संगठनात्मक प्रभाव का उपयोग किया था। वे कांग्रेसी थे, अघोषित तौर पर संघ के विरोधी समझे जाते थे। लेकिन आज आखिर ऐसी क्या बात हो गई है कि भाजपा का एक वरिष्ठ सांसद उस पर यह आरोप लगा रहा है कि संघ में 90 फ़ीसदी लोग बेईमान है। दरअसल पिछले दो दशकों से संघ की रुचि एक विशेष योजना के तहत राजनीति में बढ़ी है और उसका एक स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री के तौर पर देश की बागडोर संभाल रहा है। पर सत्ता के चरित्र ने संघ के सारे हुनर और संगठनात्मक प्रभाव को पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सत्ता के प्रभाव, नौकरशाहों की प्रबंधन शैली के आगे वह आत्म समर्पित भी दिखाई पड़ा है। उसका हिंदूत्व, वोटों के महत्व के आगे अब असहाय साबित महसूस हो रहा है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई और कई राजनीतिक क्षत्रपों ने अपनी राजनीतिक पकड़ और प्रभा- मंडल से उसके उद्देश्यों को चूना लगाने में भी कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी है। पर इतना विशाल एवं वृहद माने जाने वाला संघ आखिर इनके प्रभाव मंडल के आगे नतमस्तक सा महसूस क्यों हो रहा है। यह उसके कर्णधारों को सोचना चाहिए। आखिर एक सांसद उसे बेईमान कहने की हिम्मत कैसे कर पा रहा है। संघ के चरित्र में क्या कहीं बड़ी खोट आ गई है या वह भाजपा के शीर्ष सत्ता पुरुष के दबाव में आ जाता है। यह तथ्य है कि कांग्रेस के सत्ता - सालों में संघ का व्यक्तित्व निखरता रहा एवं प्रभावी होता रहा। पर भाजपा के सत्ता- शीर्ष पर स्थापित होते ही वह निस्तेज सा होता चला जा रहा है। आज लोग भाजपा और संघ के बीच कहीं कोई अंतर नहीं खोज पा रहे। संघ की शाखा प्रमुख से लेकर केंद्र प्रमुख तक भाजपा के सत्ता के प्रभाव के आगे नतमस्तक से हैं। वे अपने राजनीतिक पुत्र की खामियों, गड़बड़ियों और सत्ता जन्य विकारों पर नकेल रखने पर असफल, उदासीन तथा असहाय नजर आ रहे हैं। वास्तव में संघ को यह सोचना ही पड़ेगा कि आखिर आज भाजपा के अदने से कार्यकर्ता से लेकर सांसद और शीर्ष पुरुष तक उसकी अवहेलना क्यों कर रहे हैं। संघ को राजनीतिक रूचि से दूरी बनानी होगी। उसे राजनीतिक तौर पर निरपेक्ष भी होना पड़ेगा। उसके संगठनात्मक शक्तियों और प्रभाव का प्रतिफल एक राष्ट्र को मिलना चाहिए, ना की एक आदर्श विहीन होती जा रही राजनीतिक पार्टी को।

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