माेदी है ताे मुमकिन है महज नारा,जीत के लिए क्षेत्रीय दल बन रहे सहारा

माेदी है ताे मुमकिन है महज नारा,जीत के लिए क्षेत्रीय दल बन रहे सहारा





संदीप ठाकुर

नई दिल्ली । माेदी है ताे मुमकिन है का नारा बेशक गूंज रहा हाे,लेकिन भाजपा चुनाव में जीत के खातिर जिस तरह से क्षेत्रीय दलाें के साथ सीटाें काे लेकर समझौते पर समझाैता किए जा रही है उससे ताे यही लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का सीटाें काे लेकर जीत का आत्मविश्वास हकीकत कम दिखावा अधिक है। दाेनाें नेता बाेल कुछ रहे हैं और कर कुछ रहे हैं। पहले ताे उन्हाेंने छाेटे क्षेत्रीय दलाें काे झिड़क दिया था लेकिन बाद में उन्हीं छोटी पार्टियों के आगे सरेंडर करके तालमेल किए जा रहे हैं। इसे क्या समझा जाए? क्या भाजपा ने अपने सहयाेगी दलाें के साथ जितनी सीटें 2014 के चुनाव में जीती थीं उतनी इस बार जीतने की स्थिति में नहीं है ? तभी भाजपा सहयाेगी क्षेत्रीय दलाें काे नाराज करने का जाेखिम उठाना नहीं चाहती है और उनकी शर्ताें काे माने चली जा रही है।

मीडिया द्वारा पुलवामा व बालाकोट के मामले काे हाई लाईट करवा कर जिस कदर देश भर में हाइप पैदा किया गया उसे देख कर ताे पहली नजर में यही अहसास हाे रहा था कि 2019 का चुनाव एक तरफा हाेगा। यानी भाजपा की जीत पक्की। हमले काे प्रचारित भी वैसे ही किया जा रहा है। लेकिन जात पात पर बंटे चुनाव में विपक्षी दलाें के गठबंधन ने भाजपा नेताओं की नींद उड़ा कर रख दी है। भाजपा के लिए एक एक सीट जीतना महत्वपूर्ण हाे गया है। शायद यही वजह है कि पार्टी के नेता छाेटे छाेटे हर दलाें की शर्ताें के सामने झुकते चले जा रहे हैं। ताजा मामला झारखंड का है। झारखंड में भाजपा ने अपनी छोटी सहयोगी पार्टी आजसू के लिए लोकसभा की एक सीट छोड़ी है। जबकि कुछ दिन पहले तक यह कहा जा रहा था कि भाजपा उसे घास नहीं डाल रही है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने आजसू नेता को कह दिया है कि वे अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर लें या अलग लड़ें। पर अचानक भाजपा ने यू टर्न लिया और आजसू के लिए अपनी जीती हुई गिरिडीह की सीट छोड़ दी। इससे अंदाजा लग रहा है कि भाजपा को विपक्षी गठबंधन के कारण चुनाव में हाेने वाले जीत हार का डर सता रहा है।

शायद यही कारण है कि भाजपा ने पंजाब, महाराष्ट्र,बिहार, झारखंड, तमिलनाडु, पंजाब आदि सभी राज्यों में अपनी पुरानी सहयोगी पार्टियों के साथ तालमेल बनाए रखा है। माेदी व शाह काे अच्छी तरह पता है कि यदि संख्या

नहीं आई ताे प्रधानमंत्री की कुर्सीं पर टिके रहना मुमकिन नहीं हाे पाएगा। इसलिए हर जगह भाजपा ने समझौता किया है। महाराष्ट्र में भाजपा ने पुराना फार्मूला बदला और 26 की बजाय 25 सीट पर लड़ने को राजी हाे गई । यानी कि भाजपा 25 और शिवसेना 26। इससे पूर्व भाजपा को 26 और शिव सेना को 22 सीट मिलती थी। इस बार शिव सेना को 23 सीट मिली है। इसी तरह बिहार में
दो लोकसभा सांसदों वाली पार्टी जदयू के साथ भाजपा ने 17-17 सीटों पर लड़ने का समझौता किया। भाजपा ने तमिलनाडु में तो सिर्फ 5 सीटाें पर लड़ने काे हामी भर दी। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जैसे तैसे अपनी दोनों सहयोगी पार्टियों भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर और अपना दल की अनुप्रिया पटेल के सारे नखरे उठाते हुए गठबंधन बनाए रखा है।

Share it
Top