राजनीति एक सेवाधाम है, खाला का घर नहीं

राजनीति एक सेवाधाम है, खाला का घर नहीं

डॉ. वेदप्रताप वैदिक,

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने दो नेताओं को कल करारे झटके दिए हैं। एक उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को और दूसरा बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को। तेजस्वी से अदालत ने पटना का वह बंगला खाली करवा लिया है, जिसे अपनी सरकार हटने के बावजूद वे कब्जाए हुए थे। उन पर 50,000 रु. जुर्माना भी ठोका गया है। मायावती के खिलाफ 10 साल से चल रहे एक मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ सख्त टिप्पणियां कर दी हैं। उसने कहा है कि मायावती से उन सब मूर्तियों का पैसा क्यों नहीं वसूला जाए, जो उन्होंने अपनी और अपने प्रिय नेता कांशीराम आदि की मूर्तियां लगवाने पर बर्बाद किया है। याचिका दायर करनेवाले का अंदाज है कि इन मूर्तियों पर 2000 करोड़ रु. खर्च हुआ है। यह पैसा सरकारी है। जनता का है। लखनऊ और नोएडा में लगी इन मूर्तियों के साथ-साथ मायावती ने अपनी बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिन्ह 'हाथी' के भी दर्जनों पुतले खड़े करवा दिए। मायावती की अपनी मूर्ति और इन पत्थर के हाथियों को चुनावों के दौरान चुनाव आयोग ने कपड़े से ढकवा दिया था। अखिलेश यादव सरकार की तरफ से भी इस मूर्ति-कांड में हुए अरबों-खरबों रुपयों की बर्बादी और भ्रष्टाचार को लेकर अदालत के दरवाजे खटखटाए गए थे। इस मामले पर 2 अप्रैल को अदालत दुबारा बहस करेगी। हो सकता है कि वह मायावती को कुछ ढील दे दे, क्योंकि मायावती ने इस खर्च को विधानसभा से पास करवा लिया था।

मेरा कहना यह है कि इस मामले में अदालत ढील देने की बजाय नेताओं को जरा जमकर कस डाले। जिन विधायकों ने इस फिजूल खर्च के समर्थन में हाथ उठाए थे, उनसे भी पैसे वसूल किए जाएं। उनकी पेंशन रोक दी जाए। यदि विधायकों से वसूली होगी तो मायावती का बोझ भी जरा हल्का हो जाएगा, हालांकि मायावती-जैसे सदाचारी नेताओं के लिए हजार-दो हजार करोड़ रु. कोई बड़ी बात नहीं है।

सरकारी पैसे से किसी भी जीवित नेता की मूर्ति लगवाने पर प्रतिबंध हो तथा मरने के 100 साल बाद ही किसी की मूर्ति लगवाई जाए। आज जरुरत यह है कि सारे सांसदों और विधायकों को सरकारी मकानों से निकाला जाए। वे अपने रहने का इंतजाम अपनी तनख्वाह से खुद करें। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी बड़े-बड़े बंगले खाली करवाए जाएं और उन्हें छोटे मकानों या फ्लेटों में रहना सिखाया जाए। जनता के पैसे पर गुलछर्रे उड़ानेवाले हमारे सेवकों और प्रधान सेवकों को बताया जाए कि राजनीति एक सेवाधाम है, खाला (मौसी) का घर नहीं है। कबीर ने क्या खूब कहा है- यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाय। सीस उतारे, कर धरे सो पैठे घर माय ।।

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