ओ पी हो सकते हैं भाजपा के चौधरी

ओ पी हो सकते हैं भाजपा के चौधरी




गोपाल दास,

रायपुर। देश में आईएएस अधिकारीयों का राजनीतिक दलों में जाना कोई नई बात नहीं है। एक लम्बी फेहरिस्त है जिसमें अब छत्तीसगढ़ कैडर के युवा आईएएस ओपी चौधरी का नाम भी जुड़ गया है। ओपी ने अपना स्थापित कैरियर छोड़ राजनीति का दामन क्यों थामा। क्या भारतीय जनता पार्टी छत्तीसगढ़ में नए नेतृत्व की संभावनाएं तलाश रही है। ऐसे कई सवाल इन दिनों बहस का विषय बने हुए हैं। चूँकि एक युवा आईएएस ने नौकरी छोड़ी है और राजनीति में प्रवेश कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा है इसलिए ऐसे अनेकों सवाल खड़े होंगे और इस घटना को राजनीतिक चश्में से भी देखा जायेगा।

सबसे पहली बात एक होनहार युवा जो अखिल भारतीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है वह केवल सत्ता की लिप्सा के चलते राजनीती में आने का जोखिम क्यों उठाएगा। अपने ही गृह नगर से अपने ही रिश्तेदार को पराजित करना उसका मकसद कैसे हो सकता है। प्रदेश की किसी दूसरी विधानसभा से चुनाव जीतकर प्रदेश के मंत्रिमंडल में जगह बनाना भी उसका ध्येय नहीं हो सकता। तो फिर ऐसा क्या है कि ओपी चौधरी जैसे प्रतिभाशाली अधिकारी ने इतना बड़ा फैसला ले लिया।

ओपी भाजपा में जा रहे हैं इसलिए बात केवल भाजपा और वहां उनकी उपयोगिता पर ही होनी चाहिए। इस साल के अंत में प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं और छत्तीसगढ़ में पिछड़ा वर्ग की आबादी पचास फीसदी से भी अधिक है। इसलिए भाजपा का फोकस भी पिछड़ा वर्ग होगा और पिछड़ा वर्ग के नेताओं के नाम पर भाजपा के पास धरमलाल कौशिक, चंद्रशेखर साहू, रमेश बैस, लखन लाल साहू, चंदूलाल साहू जैसे नेता हैं। इनमें रमेश बैस को बुजुर्ग नेता की श्रेणी में लाकर उनका पत्ता कट करने की कवायद पार्टी में तेजी से चल रही है। धरमलाल कौशिक को राज्यसभा में भेजने की कोशिश भाजपा एक बार कर चुकी है। शेष बचे पिछड़ा वर्ग के नेता अपनी कोई विशिष्ट पहचान मौजूदा संगठन के सामने नहीं बना पाए हैं। इसलिए पिछड़ा वर्ग को लेकर भाजपा की यह स्वाभाविक चिंता हो सकती है कि कांग्रेस के पास भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू और चरणदास महंत जैसे नेता हैं जिन्हे आगे कर कांग्रेस समर में कूद रही है। संभवतः यही कारण है कि भाजपा ने ओपी चौधरी नाम का ब्रम्हास्त्र चला दिया।

इस घटना के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ओपी चुनाव कहाँ से लड़ेंगे। जानकारों की माने तो ओपी कहीं से भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहे। पार्टी उन्हें केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश में पिछड़ावर्ग का युवा चेहरा बना कर प्रस्तुत कर सकती है। ओपी बस्तर में कमजोर भाजपा को मजबूत बना सकते हैं क्योकि दक्षिण बस्तर में उन्होंने लम्बे समय तक काम किया है। ओपी का वास्तविक उपयोग लोकसभा चुनाव में होगा। हो सकता है कि भाजपा अपने पिछड़ा वर्ग के सबसे वरिष्ठ नेता रमेश बैस को किसी राज्य का राज्यपाल बनाकर सम्मान सहित विदाई दे और रायपुर लोकसभा से ओपी चौधरी को मैदान में उतारा जाये। इसमें कोई दो राय नहीं कि ओपी रायपुर लोकसभा के बेहतर प्रत्याशी होंगे और वे जीत भी सकते हैं क्योकि वे रायपुर में कलेक्टर रहे हैं और शहरी जनता में उनकी छवि भी अच्छी है। वर्ष 2019 में मोदी सरकार केंद्र में आती है तो ओपी उस सरकार का हिस्सा जरूर होंगे। भाजपा ओपी को केंद्र में अपने पास रखेगी और केंद्र तथा राज्य की सत्ता में संतुलन बनाये रखने में उनका उपयोग करेगी। अगर ये कयास नहीं है तो तय मानिये की आने वाले समय में ओपी छत्तीसगढ़ में भाजपा के चौधरी हो सकते हैं।

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