ममता पर भी चढ़ा प्रदेश के नाम बदलने का बुखार

ममता पर भी चढ़ा प्रदेश के नाम बदलने का बुखार

संदीप ठाकुर,

नई दिल्ली। विलियम शेक्सपियर ने कहा था- 'नाम में क्या रखा है? किसी चीज का नाम बदल देने से भी चीज ताे वही रहेगी। चीज ताे नहीं बदल जाएगी। गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो,वह गुलाब ही रहेगा।' परंतु लगता है कि देश में राजनीति करने वालाें ने या ताे शेक्सपियर काे पढ़ा नहीं है या फिर उन्हें यह बात समझ नहीं आती। तभी ताे देश में प्रदेश,शहर,सड़क,गली,मुहल्ले आजि के नाम बदलने काे लेकर आए दिन राजनीति हाेती रहती है। हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज कर दिया। नाम बदलने का फायदा क्या हाेगा यब ताे वक्त बताएगा,लेकिन यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। अब ममता बनर्जी की सरकार चाहती है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदल कर बांग्ला किया जाए। लेकिन केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल का नाम बदलने के राज्य सरकार के प्रस्ताव में अड़ंगा डाल दिया है।

गृह मंत्रालय के सूत्राें ने बताया कि इस आशय का एक प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास आया है। पर केंद्र ने इसे विदेश मंत्रालय के पास भेज कर मामले को अटका दिया है। विदेश मंत्रालय से इस पर राय मांगी गई है कि बांग्ला नाम करने से बांग्लादेश के साथ किसी तरह का टकराव या कंफ्यूजन तो नहीं होता है। सरकार के अधिकारियों का कहना है कि बांग्ला और बांग्लादेश बहुत एक जैसा लग रहा है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंफ्यूजन हो सकता है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने बंगाली अस्मिता की वजह से बांग्ला नाम चुना है। इसके लिए तर्क दिया गया है कि पश्चिम बंगाल राज्य का नाम तब था, जब पूर्वी बंगाल भारत का हिस्सा था। जब पूर्वी बंगाल बांग्लादेश बन गया तो पश्चिम बंगाल नाम का कोई औचित्य नहीं है। दूसरा तर्क यह दिया गया है कि राज्य का अंग्रेजी नाम डब्लु से शुरू होता है इसलिए किसी भी सरकारी कार्यक्रम में राज्य का नंबर सबसे आखिर में आता है। इसलिए राज्य का नाम बदला जाना चाहिए। ममता सरकार ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि नाम नहीं बदला जाता है तो राज्य में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा।

नाम बदलने के पीछे क्या मकसद हाेता है यह आज तक स्पष्ट नहीं हाे पाया है।

गत वर्ष नई दिल्ली के रेसकोर्स का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग कर दिया गया। हुआ क्या? कितनों को याद हुआ होगा ? बाेलचाल में आज भी लाेग रेसकाेर्स ही बाेलते हैं। अॉटाे हाे या टैक्सी सभी रेसकाेर्स ही कहते हैं। यदि मेट्रो स्टेशन वहां नहीं होता तो ये नाम भी शायद सिर्फ कागजों पर होता। यूपीए सरकार के समय भी कनाट प्लेस और कनाट सर्कस का नाम बदलकर राजीव चौक और इंदिरा चौक हुआ कर दिया गया था। इस बात को एक दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग कनाट प्लेस ही जाते हैं। अगर कनाट प्लेस का नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं होती। हाल ही में याेगी सरकार ने भी इलाहाबाद का नाम बदल प्रयागराज कर दिया है। लेकिन बाेलचाल में वह आज भी इलाहाबाद ही है। एक बड़े वर्ग का तर्क है कि शुरुआत ताे कांग्रेस ने किया तो फिर भाजपा भी क्यों न करे? लेकिन साेचने वाली बात यह है कि यदि किसी सरकार ने कुछ गलत किया ताे क्या माैजूदा सरकार काे भी वही गलतियां दाेहराना चाहिए या फिर उन गलतियों से सबक लेना चाहिए।

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