पूर्वोत्तर में भाजपा फिर से लहराया पाएगी परचम !

पूर्वोत्तर में भाजपा फिर से लहराया पाएगी परचम !





संदीप ठाकुर,

नई दिल्ली। पुलवामा क्या हुआ भाजपा की बल्ले बल्ले हाे गई। जवानाें पर हुए आतंकी हमले काे मीडिया की मदद से बदले में बदला गया। फिर बदले काे युद्धाेन्माद में और फिर इसे राष्ट्रवाद का जामा पहना दिया गया। ऐसा माना जा रहा है कि चरण दर चरण चले इस अभियान में भाजपा का ग्राफ काफी बढ़ गया है। लेकिन पूर्वाेत्तर के राज्याें में क्या देशभक्ति का असर हाेगा। वर्तमान में ताे क्षेत्र के आठ राज्यों में या तो बीजेपी का शासन है या इसके सहयोगियों का। ऐसा माना जा रहा है कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 पर भाजपा के कड़े रुख का खामियाजा पार्टी काे उठाना पड़ सकता है।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगियों ने एक साथ मिलकर 11 सीटें जीती थी, जिसमें बीजेपी को आठ सीटें मिली थीं। कांग्रेस का 1952 से पूर्वोत्तर मजबूत गढ़ रहा है। पिछले लाेकसभा चुनाव में वह 8 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। कांग्रेस ने असम में 3, मणिपुर में 2 व अरुणाचल प्रदेश, मेघालय व मिजोरम प्रत्येक में 1-1 सीट पर विजय हासिल की थी। पांच साल पहले असम के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने तीन सीटें, जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने त्रिपुरा में दो सीटें हासिल की थीं। इस बार भाजपा के लिए पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में कम से कम 25 लोकसभा सीटें जीतना बेहद टेड़ी खीर है। राजग के सहयोगियों में नगा पीपुल्स फ्रंट (एक सीट), मेघालय पीपुल्स पार्टी (एक सीट) और सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एक सीट) शामिल हैं।

नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 ने बीजेपी की समग्र छवि पर कुछ नकारात्मक प्रभाव डाला है। असम गण परिषद (एजीपी) ने दो महीने पहले विधेयक को लेकर बीजेपी की अगुवाई वाला गठबंधन छोड़ दिया है। इस विधेयक से कुछ नुकसान हो सकता है। नेफियू रियो की नैशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (नगालैंड में), जोरामथंगा की मिजो नैशनल फ्रंट (मिजोरम में) ने स्पष्ट तौर पर नागालैंड व मिजोरम में भगवा पार्टी के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ने की बात कही है। कोनराड के. संगमा की नैशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) को मेघालय की दो सीटों में से एक पर साझेदारी के लिए राजी करना मुश्किल होगा। एनपीपी, नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलांयस (एनईडीए) का सदस्य है। पूर्वोत्तर में 27-28 फीसदी आबादी वाले जनजातीय लोग पहाड़ी क्षेत्र की राजनीतिक में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश के दूसरे राज्यों के विपरीत पूर्वोत्तर में चुनावी राजनीति में मूल पहचान का मुद्दा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। पूर्वोत्तर की पहचान देश के दूसरे भागों से कुछ अलग हैष इसलिए यहां मुद्दे भी अलग हैं। देखना दिलचस्प हाेगा कि इस बार पूर्वाेंतर के राज्याें में भाजपा फिर से बाजी मार ले जाती है या फिर वाेटर अपनी जानी पहचानी पुरानी पार्टी कांग्रेस काे जीताते हैं।

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