2019 में दक्षिण भारत कांग्रेस काे डूबाएगा या उबारेगा ?

2019 में दक्षिण भारत कांग्रेस काे डूबाएगा या उबारेगा ?

संदीप ठाकुर,

नई दिल्ली। कांग्रेस इनदिनाें ऐतिहासिक संकट के दौर से गुजर रही है। उत्तर भारत में वह अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी काे थाेड़ी बहुत उम्मीद है ताे दक्षिण भारत से। उम्मीद इसलिए है कि कांग्रेस जब भी संकट में रही है ताे दक्षिण भारत उसके लिए संकट माेचक बन कर आया है। इस बार भी दक्षिण भारत के क्षत्रप उसके बचाव में उतरे हैं। पर इस दफा तस्वीर थाेड़ी अलग है। इस बार यकीन से साथ यह नहीं कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत के क्षत्रप कांग्रेस को बचाएंगे या डूबो देंगे। इसका सबसे अहम् कारण यह है कि इस बार भाजपा ने भी दक्षिण भारत में अपना पांव जमाने के लिए एेड़ी चाेटी का जाेर लगा दिया है। वह प्रादेशिक क्षत्रपों के साथ तालमेल बिठाने के लिए गुणा भाग करने में लगी है। यदि प्रमुख क्षत्रपाें से भाजपा ने तालमेल बिठा लिया ताे कांग्रेस के लिए भारी मुश्किल हाे जाएगी। दूसरा, कांग्रेस ने जहां भी प्रादेशिक क्षत्रपों के सहयोग से राजनीति की है वहां उसका वजूद धीरे धीरे खत्म होता चला गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक इसकी मिसाल है।

वैसे अतीत के आइने में झांके ताे पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी जब भी संकट में रही है तो उसे दक्षिण भारत ने बचाया है। इंदिरा गांधी 1977 में चुनाव हारीं तो उन्होंने चिकमगलूर से उपचुनाव लड़ा और बड़े धमाके के साथ राजनीति में वापसी की। 1977 के चुनाव में भी पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया था पर दक्षिण भारत के राज्यों ने उसकी इज्जत बचाई थी। इसी तरह 1989 के चुनाव में भी कांग्रेस की लाज दक्षिण भारत से बची और उसके अगले चुनाव में यानी 1991 में कांग्रेस को अल्पमत की सरकार बनाने लायक संख्या भी दक्षिण भारत से ही मिली। 2004 और 2009 में कांग्रेस की दोनों सरकारें आंध्र प्रदेश में मिली भारी भरकम जीत से बनी थी। पर तब कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ती थी। लेकिन अब परिस्थिति काफी बदल गई है। तभी कांग्रेस के कई नेता कर्नाटक और आंध्र प्रदेश को लेकर हो रही राजनीतिक से चिंतित हैं।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राहुल गांधी से मुलाकात की और भाजपा को रोकने के लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ जैसी बड़ी बड़ी बातें कहीं। पर दरअसल उन्हें खुद को बचाना है वाईएसआर कांग्रेस और भाजपा से। ये दोनों पार्टियां मिल कर लड़ें और कांग्रेस अकेले लड़े तो टीडीपी कमजोर होगी। सो, उसने कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ने का दांव चला है। राज्य की 25 लोकसभा में से 16 सीटें उनके पास हैं। सो, वे कांग्रेस के लिए कितनी सीटें छोड़ सकते हैं यह देखने वाली बात हाेगी। इसी तरह तेलंगाना में कांग्रेस, टीडीपी, तेलंगाना जन सेना, बसपा, लेफ्ट आदि का तालमेल होता है तो कांग्रेस के खाते में बहुत कम सीटें आएंगी। तमिलनाडु में डीएमके ने कांग्रेस को पांच सीटों पर समेट दिया है। और कर्नाटक में भी कांग्रेस को 28 में से आठ या दस सीटें जेडीएस के लिए छोड़नी होंगी। केरल में पहले ही कांग्रेस को यूडीएफ की सहयोगी पार्टियों के साथ सीट शेयर करनी पड़ती है। कुल मिला कर पांच राज्यों की 129 सीटों में से कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा 60-70 सीटों पर लड़ पाएगी। इनमें से पार्टी की जीत कितनी सीटाें पर हाेगी यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।

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