अयोध्या भूमि विवाद पर मध्यस्थता के लिए समिति गठित, रिपाेर्ट अगले माह

अयोध्या भूमि विवाद पर मध्यस्थता के लिए समिति गठित, रिपाेर्ट अगले माह

संदीप ठाकुर,

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की मध्यस्थता के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस समिति के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफएमआईकलीफुल्ला अध्यक्ष और श्रीश्री रविशंकर और अधिवक्ता श्रीराम पंचू को सदस्य बनाया गया है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने शुक्रवार को कहा कि मध्यस्थता की कार्यवाही उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में होगी और यह प्रक्रिया एक सप्ताह के भीतर शुरू हो जानी चाहिए। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। उधर समिति के एक सदस्य काे लेकर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति जताई है।

पीठ ने कहा कि मध्यस्थता करने वाली यह समिति चार सप्ताह के भीतर अपनी कार्यवाही की प्रगति रिपोर्ट दायर करेगी। यह प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर

पूरी हो जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता कार्यवाही की सफलता सुनिश्चित करने के लिए 'अत्यंत गोपनीयता' बरते हुए प्रिंट तथा
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर रोक लगा दी है। पीठ ने कहा कि मध्यस्थता समिति इसमें और अधिक सदस्यों को शामिल कर सकती है और इस संबंध में किसी भी तरह की परेशानी की स्थिति में समिति के अध्यक्ष शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को इसकी जानकारी देंगे। मालूम हाे कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में 14 याचिकाएं दायर हुई हैं। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि तीनों पक्षकारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांट दी जाए।

मध्यस्थता के लिए गठित पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एफ. एम. कलीफुल्ला को दी है। तमिलनाडु के रहने वाले जस्टिस

कलीफुल्ला का पूरा नाम फाकिर मुहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला है। अपने लंबे न्यायिक सफर में उन्होंने एक वकील से लेकर हाई कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के
चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के जज तक का रास्ता तय किया। 20 अगस्त 1975 को वकालत की शुरुआत करने वाले कलीफुल्ला 2000 में मद्रास हाई कोर्ट में परमानेंट जज नियुक्त हुए। फरवरी 2011 में वह जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के जज बने और दो हफ्ते बाद ही ऐक्टिंग चीफ जस्टिस नियुक्त हुए। सितंबर 2012 में वह जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त हुए। उसके बाद, 2 अप्रैल 2012 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने और 22 जुलाई 2016 को रिटायर हुए। मध्यस्थता समिति में जाने-माने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर भी शामिल हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर इससे पहले भी व्यक्तिगत स्तर पर अयोध्या मामले को सुलझाने की पहल कर चुके हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिली। समिति के तीसरे सदस्य श्रीराम पांचू हैं। 40 सालों से वकालत कर रहे वरिष्ठ वकील पांचू पिछले 20 सालों से सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। वह मिडिएशन चैंबर्स के संस्थापक हैं। उन्होंने देश के तमाम हिस्सों में व्यावसायिक, कॉरपोरेट और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई बड़े और जटिल विवादों में मध्यस्थता कर चुके हैं।

तीन सदस्यीय पैनल में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर को शामिल किए जाने पर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति जताई है। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि श्री श्री रविशंकर को सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थ बनाया है लेकिन उनका पहले का एक बयान सबके सामने है जिसमें वह कहते हैं कि अगर मुसलमान अयोध्या पर अपना दावा नहीं छोड़ते हैं तो भारत सीरिया बन जाएगा। ओवैसी ने आगे कहा कि बेहतर होता कि SC ने किसी न्यूट्रल व्यक्ति को मध्यस्थ बनाया होता। उधर फैसले पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए श्री श्री ने कहा कि सदियों से जारी संघर्ष को समाप्त करना ही हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। श्रीश्री रविशंकर ने ट्वीट कर कहा, 'सबका सम्मान करना, सपनों को साकार करना, सदियों के संघर्ष का सुखांत करना और समाज में समरसता बनाए रखना- इस लक्ष्य की ओर सबको चलना है। वहीं, पैनल के चेयरमैन रिटायर्ड जस्टिस एफएम कलीफुल्ला की तरफ से भी पहली प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने कहा, ' SC ने मेरी अगुआई में एक मध्यस्थ समिति का गठन किया है। मुझे अभी ऑर्डर की कॉपी नहीं मिली है। मैं यहीं कह सकता हूं कि अगर समिति गठित की गई है तो हम इस मसले को मैत्रीपूर्ण तरीके से सुलझाने की हरसंभव कोशिश करेंगे।' दारुल उलूम नदवतुल उलेमा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मौलाना सलमान नदवी ने कहा है कि इस्लामी शरीयत मस्जिद शिफ्ट करने की इजाज़त देती है और राम भी हमारे लिये एक पैगंबर हैं। इसलिये अमन की खातिर मस्जिद के लिये दूसरी जगह बड़ी ज़मीन लेकर समझौता कर लेना चाहिए। उमा भारती ने कहा कि वहां राम लला का मंदिर बनना ही चाहिए क्याेंकि वहां उनका जन्म हुआ था।


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